Wednesday, August 8, 2012

.. वो आई थी क्या !

मैं रोज़गार के सिलसिले में
कभी कभी उसके शहर जाता हूँ
तो गुज़रता हूँ उस गली से
वो नीम तारिक़ सी गली
और उसी के नुक्कड़ पे
ऊँघता सा पुराना खंभा
उसी के नीचे तमाम शब् इंतज़ार करके
मैं छोड़ आया था शहर उसका
बहुत ही खस्ता सी रोशनी की छड़ी को टेके
वो खम्भा अब भी वहीँ खड़ा है

फितूर है ये मगर मैं खम्भे के पास जाकर 

नज़र बचाकर मोहल्ले वालों की
पूछ लेता हूँ आज भी ये
वो मेरे जाने के बाद भी आई तो नहीं थी
.. वो आई थी क्या !


~ गुलज़ार

6 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

गुलज़ार के बारे में क्‍या कहाना

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

SAJAN.AAWARA said...

उम्दा।।

Shekhar Suman said...

आपकी इस पोस्ट को आज के शुभ दिन ब्लॉग बुलेटिन के साथ गुलज़ार से गुल्ज़ारियत तक पर शामिल किया गया है....

tushar said...

Golden words

ajit singhal said...

इतनी साफगोई भला गुलज़ार साहेब के अलावा कहाँ