Friday, December 17, 2010

ग़म की डली



तुम्हारे ग़म की डली उठाकर
जुबां पर रख ली है देखो मैंने
ये  कतरा-कतरा पिघल रही है
मैं कतरा कतरा ही जी रहा हूँ

पिघल पिघलकर गले से उतरेगी
आखरी बूँद दर्द की जब
मैं साँस आखरी गिरह को भी खोल दूँगा
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4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

अरे वाह...!
यह रचना तो बहुत मखमली है!

venus****"ज़ोया" said...

shurkiyaa mayank ji..yahaan taak aane ke liye

ZEAL said...

बेहतरीन प्रस्तुति !

Yudhisthar raj said...

लाजवाब प्रस्तुति..💐💐🍀👏